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Das Lakshan Parva 4 min read

संयम धर्म

संयम धर्म केवल बाह्य नियंत्रण नहीं, बल्कि आत्मा की आंतरिक जागरूकता है।

दशलक्षण धर्म पर्व २०२६

Ten virtues, one each day · 6 of 10 written

  1. क्षमा Forgiveness
  2. मार्दव Humility
  3. आर्जव Simplicity
  4. शौच Purity
  5. सत्य Truth
  6. संयम Restraint
  7. तप Austerity
  8. त्याग Renunciation
  9. आकिंचन्य Detachment
  10. १० ब्रह्मचर्य Chastity

प्रिय जन
ॐ नमः
देव शास्त्र गुरु को नमन।
आज उत्तम संयम धर्म का दिन है।

जैसा कि मैंने कल लिखा था कि यहाँ हमें अब तक धारण किए गए उत्तम धर्मों पर अपने अन्तर मन में झांक कर देखना चाहिए कि अब तक किए गए प्रयासों का हम पर क्या प्रभाव पड़ा है कुछ प्रभाव पड़ा भी है या नहीं और अगर हम पाते हैं कि हाँ हमने अपने आप को तैयार कर लिया है आगे के धर्म धारण करने की यात्रा के लिए और हम में अन्तर में कुछ जागरण हुआ है आगे के धर्मों को जानने समझने की उत्सुकता उत्पन्न हुई है तब तो आगे का मार्ग सुगम होगा हम धर्म के पथ पर आगे बढ़ जाएंगे उसके बिना तो जैसे किसान की बिना उचित तैयारी के की गई बुआई अच्छी फसल नहीं दे सकती है उसी प्रकार बिना आरंभिक तैयारी के किए गए धर्म धारण के प्रयास कुछ ज्यादा प्रभावी नहीं हो पाएंगे, यद्यपि प्रयास तो करते ही रहना चाहिए। यहाँ एक बहुत उपयुक्त परीक्षा आपको बताना चाहता हूँ वह है संयम धारण करने की सामर्थ्य।

आप कोई भी छोटे से छोटा नियम लेने का प्रयास कीजिए अगर आप ऐसा कर सकें तो निश्चित जानिए आप में वह सामर्थ्य है। आध्यात्मिक स्तर से जानें तो पाते हैं कि यह सामर्थ्य केवल और केवल मनुष्य में ही हो सकती है न तो किसी पशु में और न ही किसी स्वर्ग के देवों में। इसीलिए मनुष्य योनि को धर्म शास्त्रों में वर्णित ८४ लाख योनियों में अत्यन्त दुर्लभ एवं सर्वोत्तम बताया है कि आत्मा इस अवस्था में आने पर संयम आदि धारण कर अपना मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। अस्तु!

अब हम आज के उत्तम संयम धर्म पर चर्चा करते हैं।

शब्द विवेचना: ‘संयम’ का आगमिक और साहित्यिक अर्थ

“संयम” शब्द संस्कृत की ‘यम्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है — रोकना, नियंत्रित करना।

तत्त्वार्थसूत्र (9/6) में संयम को परिभाषित किया गया है:

“संयमः इन्द्रियमनोनिग्रहः” — इंद्रियों और मन का निग्रह ही संयम है।

राजवार्तिक (9/6/27/599/19) में कहा गया है:

“तमुतिष्ठिन्तिनिहैव पूज्यते परत्र किमस्ति वाच्यम्” — जो संयम का पालन करता है, वह परलोक में पूज्य होता है।

भगवती आराधना की विजयोदया टीका में संयम को आत्मा की वीतरागता की ओर ले जाने वाला मार्ग बताया गया है।

जैन आगमों में संयम धर्म की महत्ता

संयम धर्म को जैन दर्शन में चारित्र धर्म का मूल कहा गया है।

आचारांग सूत्र में संयम को तीर्थंकरों की साधना का आधार बताया गया है।

उत्तराध्ययन सूत्र में संयम को आत्मा की रक्षा का साधन कहा गया है —

“संयम आत्मा का कवच है, जो उसे भवसागर की लहरों से बचाता है।”

गोम्मटसार जीवकांड में संयम को दो प्रकारों में विभाजित किया गया है:

  • देश संयम — आंशिक व्रतों द्वारा संयम
  • सकल संयम — पूर्ण संयम, जैसे मुनियों का

दशलक्षण धर्म पर्व में संयम धर्म का स्थान

दशलक्षण धर्म पर्व के छठे दिन उत्तम संयम धर्म की आराधना की जाती है।
यह दिन साधक को आत्म-निरीक्षण की प्रेरणा देता है — क्या मैं इंद्रियों के विषयों में लिप्त हूँ? क्या मेरा मन वश में है? क्या मेरी वाणी संयमित है?

इस पर्व का उद्देश्य है —

  • इंद्रिय निग्रह
  • मन, वचन, काय की शुद्धता
  • व्रत, समिति, गुप्ति का पालन
  • आत्मा को असंयम से मुक्त करना

संयम धर्म का आत्मिक पक्ष

संयम धर्म केवल बाह्य नियंत्रण नहीं, बल्कि आत्मा की आंतरिक जागरूकता है।

पंच संग्रह (1/127) में कहा गया है:

“व्रत, समिति, कषाय-निग्रह, पंचेन्द्रिय-विजय — यही संयम है।”

समणसुत्त (137) में संयम को कछुए की भांति बताया गया है —

“जैसे कछुआ अपने अंगों को समेटता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष पापों को संयम से समेटता है।”

ज्ञानार्णव ग्रंथ में संयम को आत्मा की स्थिरता और समत्व का द्वार कहा गया है।

व्यवहारिक जीवन में संयम धर्म की प्रासंगिकता

आज के युग में जहाँ भोग, तृष्णा और प्रतिक्रियात्मकता जीवन का हिस्सा बन गए हैं, संयम धर्म एक आत्मिक क्रांति है।
यह हमें सिखाता है कि सच्चा धर्म वह है जो भीतर से नियंत्रित हो — जहाँ इंद्रियाँ, मन और वाणी आत्मा के अधीन हों।

  • संयम से जीवन में शांति आती है
  • संयम से संबंधों में समरसता आती है
  • संयम से आत्मा में स्थिरता आती है

संयम धर्म की साधना विधि

दशलक्षण धर्म पर्व के छठे दिन साधक को चाहिए कि वह:

  • इंद्रियों की प्रवृत्तियों का परीक्षण करे
  • मन की चंचलता को नियंत्रित करे
  • व्रतों, समितियों और गुप्तियों का पालन करे
  • आत्मा को असंयम से मुक्त करने का संकल्प ले

यह साधना आत्मा को उसकी मूल प्रकृति — वीतरागता — की ओर लौटाती है।

निष्कर्ष: संयम धर्म — आत्मा की जागरूकता का पर्व

संयम धर्म आत्मा की वह अवस्था है जहाँ कोई विकार नहीं होता।
यह धर्म हमें सिखाता है कि मोक्ष की राह नियंत्रण से होकर जाती है — जहाँ इंद्रियाँ, मन और वाणी आत्मा के अधीन हों।

जैसे सर्वार्थसिद्धि में कहा गया है:

“संयम धर्म के बिना आत्मा अस्थिर रहती है, और नियंत्रण ही उसे मोक्ष की ओर ले जाता है।”

संयम से जीवन में शांति आती है
संयम से संबंधों में समरसता आती है
संयम से आत्मा में स्थिरता आती है

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