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दशलक्षण धर्म पर्व 6 min read

रत्नत्रय पर्व: आत्मा के तीन रत्नों की आराधना

रत्नत्रय पर्व आत्मा को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की त्रिवेणी में स्नान कराकर मोक्षमार्ग पर प्रतिष्ठित करता है।

दशलक्षण धर्म पर्व २०२६

Ten virtues and two more days · 12 of 12 written

  1. १ क्षमा Forgiveness
  2. २ मार्दव Humility
  3. ३ आर्जव Simplicity
  4. ४ शौच Purity
  5. ५ सत्य Truth
  6. ६ संयम Restraint
  7. ७ तप Austerity
  8. ८ त्याग Renunciation
  9. ९ आकिंचन्य Detachment
  10. १० ब्रह्मचर्य Chastity
  11. ११ रत्नत्रय Three Jewels
  12. १२ क्षमावाणी Kshamavani
सार · AI
  • दशलक्षण के बाद भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तक रत्नत्रय पर्व आता है; वर्ष में तीन बार — भाद्रपद, पौष और वैशाख में।
  • तीन दिन तीन रत्नों के हैं: त्रयोदशी को सम्यग्दर्शन, चतुर्दशी को सम्यग्ज्ञान, और पूर्णिमा को सम्यक्चारित्र।
  • भूमिका में वे कहते हैं कि सम्यग्दर्शन ही वह रत्न है जो अमरत्व देता है; एक बार वह हो जाए तो ज्ञान और चारित्र उसकी स्वाभाविक परिणति हैं।
  • पर्व का आधार तत्त्वार्थसूत्र का पहला सूत्र है — 'सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।'

यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है और इसमें त्रुटि हो सकती है। मूल लेख ही प्रामाणिक है।

प्रिय जन
ॐ नमः
देव शास्त्र गुरु को नमन।

पहले थोड़ा स्पष्टीकरण। कल के विवरण में दशलक्षणों के सार संग्रह में प्रत्येक धर्म के विवरण में अन्तिम लाइन में वह दोष है जिसे यह धर्म दूर करता है अथवा उस दोष को दूर कर इस धर्म की स्थापना करनी है। जैसे उत्तम क्षमा धर्म की अन्तिम लाइन में क्रोध है, अतः पहले क्रोध को दूर करना तब उत्तम क्षमा धर्म धारण करना है। अस्तु!

अब हम रत्नत्रय धर्म पर चर्चा करेंगे।

इससे पहले कि इस पर विस्तार से बात करें, पहले कुछ भूमिका लिखता हूँ। एक शब्द के अनेक संदर्भों में अनेक अर्थ होते हैं। धर्म शब्द का एक अर्थ गुण होता है, जैसे अग्नि का नैसर्गिक गुण ऊष्मा है, यह उसका धर्म है। यह बात अलग है कि वह गुण सद्गुण है या दुर्गुण। अच्छा या बुरा होना दृष्टिकोण पर निर्भर है। तब दशलक्षण धर्म के संदर्भ में हमने जाना कि वे दस गुण सद्गुण हैं, अतः आत्मा में धारण करने योग्य हैं। अब हम देखेंगे कि रत्नत्रय धर्म में धर्म किस संदर्भ में आता है और इसका क्या तात्पर्य है।

लोक में प्रतिदिन हम जानते हैं कि मूल्यवान रत्न किसे कहते हैं। शृंगार के लिए आभूषणों में जड़े जा सकने वाले वे प्रस्तर खंड, जिनसे हमारा शरीर अधिक सुन्दर व चित्ताकर्षक लगे, वही तो मूल्यवान रत्न कहलाते हैं। उनका मूल्य उनकी दुर्लभता, और उपयोग होने पर आँखों को दिखने में सुंदरता में वृद्धि होना ही है, यही उसका मूल्यपना है, अन्यथा उनका कोई अन्य विशेष उपयोग नहीं है। तब अगर हमें कोई ऐसा रत्न मिल जाए जो अमृत के समान हो और हमें अमरत्व प्रदान कर दे, तब उसकी महिमा की क्या तुलना। यहाँ मेरा आशय है सम्यक दर्शन रूपी रत्न से। जिस आत्मा को सच्चा सम्यक दर्शन रूपी रत्न मिल जाए और साधक क्षायिक सम्यक दर्शन तक उत्थान कर ले, तब तो शनैः शनैः उसे वह अमरत्व प्राप्त हो जाएगा, जहाँ से उसे मरण-जन्म-मरण के चक्कर से सदा सर्वदा के लिए छुटकारा मिल जाएगा। एक बार सच्चा सम्यक दर्शन हो जाए तब सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र तो उसकी स्वाभाविक परिणति है। अतः सम्यक दर्शन रूपी रत्न के समान कोई दूसरा रत्न नहीं है। इस रत्नत्रयी धर्म की आराधना ही भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की १३ से १५ तिथि तक की जाती है। अब हम इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

जैन धर्म की साधना परंपरा में कुछ पर्व ऐसे हैं जो केवल तिथियों से नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई से जुड़ते हैं। वे पर्व आत्मा को उसके मूल स्वरूप की ओर लौटने का निमंत्रण देते हैं। उनमें से एक है रत्नत्रय पर्व — जो आत्मा को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की त्रिवेणी में स्नान कराकर मोक्षमार्ग पर प्रतिष्ठित करता है। यह पर्व केवल पूजन नहीं, केवल व्रत नहीं, केवल भावना नहीं — यह आत्मा की त्रिरत्नमयी यात्रा है।

यह पर्व भी वर्ष में तीन बार आता है — भाद्रपद, पौष और वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में। प्रत्येक बार इसका आयोजन त्रयोदशी से पूर्णिमा तक होता है, और इसकी साधना तीन दिन की होती है — त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा। यह आयोजन केवल परंपरा नहीं, आत्मा की त्रैविधिक शुद्धि है। यह पर्व दशलक्षण धर्म की तरह ही व्यापक है, परंतु इसकी दिशा भीतर की ओर है — जहाँ आत्मा स्वयं को देखती है, समझती है और साधती है।

जब त्रयोदशी की प्रभा में साधक अपने अंतःकरण को जाग्रत करता है, तो वह केवल दीप नहीं जलाता — वह अपने भीतर के अज्ञान को बुझाता है। वह केवल पुष्प नहीं चढ़ाता — वह अपने भीतर के विकारों को समर्पित करता है। वह केवल मंत्र नहीं जपता — वह आत्मा की गूंज को सुनता है। त्रयोदशी का दिन सम्यग्दर्शन की आराधना का दिन होता है। यह वह क्षण है जब आत्मा मिथ्यात्व की परछाइयों से निकलकर श्रद्धा के प्रकाश में प्रवेश करती है। साधक अपने भीतर के भ्रम को पहचानता है, उसे त्यागता है, और जिनेन्द्र भगवान के सम्यक स्वरूप को स्वीकार करता है। वह कहता है — “हे जिनेन्द्र! अब मैं भ्रम नहीं, श्रद्धा चाहता हूँ। अब मैं अंधकार नहीं, प्रकाश चाहता हूँ। अब मैं बाह्य नहीं, आत्मा चाहता हूँ।” इस दिन दीपक जलाए जाते हैं, जिनवाणी का पाठ होता है, और आत्मा को सम्यग्दर्शन की ओर मोड़ा जाता है। मंदिरों में सम्यग्दर्शन स्तुति, दीप पूजन और श्रद्धा भावना का आयोजन होता है। व्रती उपवास करता है या एकाशन से पूजन करता है।

चतुर्दशी को आत्मा के लिए ज्ञान का द्वार खुलता है। यह दिन सम्यग्ज्ञान की आराधना का दिन होता है — जहाँ श्रद्धा के बाद विवेक का प्रवेश होता है। साधक आगमों का अध्ययन करता है, प्रवचन सुनता है, और आत्मा के स्वरूप को समझने का प्रयास करता है। वह कहता है — “हे जिनेन्द्र! अब मैं जानना चाहता हूँ — स्वयं को, संसार को, और मोक्ष को। अब मैं भ्रम नहीं, विवेक चाहता हूँ। अब मैं शब्द नहीं, अर्थ चाहता हूँ।” इस दिन जिनवाणी का वाचन, आगमों का पाठ और ज्ञान की आराधना होती है। मंदिरों में ज्ञान स्तुति, शास्त्र पूजन और विवेक भावना का आयोजन होता है। व्रती मौन धारण करता है, और आत्मा को ज्ञान की ओर मोड़ता है।

पूर्णिमा को आत्मा की चरम अवस्था आती है — सम्यक्चारित्र की। यह दिन संयम, तप और आत्म-निग्रह का दिन होता है। श्रद्धा और ज्ञान के बाद अब आचरण की परीक्षा होती है। साधक अपने आचरण को शुद्ध करता है, व्रतों का पालन करता है, और कषायों को नियंत्रित करता है। वह कहता है — “हे जिनेन्द्र! अब मैं चलना चाहता हूँ — उस मार्ग पर जो मोक्ष की ओर जाता है। अब मैं करना चाहता हूँ — वह जो आत्मा को निर्मल बनाता है। अब मैं जीना चाहता हूँ — संयम, तप और शुद्धि के साथ।” इस दिन चरित्र स्तुति, व्रत पूजन और संयम भावना का आयोजन होता है। व्रती उपवास करता है, और पूर्णिमा को आत्मा को समर्पित करता है।

तीन दिन की यह साधना केवल क्रम नहीं — यह आत्मा की यात्रा है। त्रयोदशी को श्रद्धा, चतुर्दशी को ज्ञान और पूर्णिमा को आचरण — यह क्रम आत्मा को मोक्षमार्ग पर प्रतिष्ठित करता है। यह पर्व केवल विधि नहीं — यह भाव है। यह पर्व केवल पूजन नहीं — यह आत्मा की सुगंध है।

रत्नत्रय पर्व का आगमिक संकेत तत्त्वार्थसूत्र में स्पष्ट रूप से आता है — “सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।” यही वाक्य इस पर्व का मूल है। यही सूत्र इस पर्व का आधार है। यही भावना इस पर्व की आत्मा है। श्रावकाचार में भी इन तीन रत्नों की महिमा का वर्णन है — जहाँ व्रत, संयम और श्रद्धा को आत्मा की शुद्धि का मार्ग बताया गया है।

मंदिरों में इस पर्व का आयोजन अत्यंत भव्य होता है। दीपमालाएँ सजाई जाती हैं, जिनवाणी का पाठ होता है, प्रवचन होते हैं, और सामूहिक आराधना होती है। व्रती परिवारों में विशेष श्रद्धा होती है, और बच्चे भी इस पर्व में भाग लेते हैं। यह पर्व केवल साधना नहीं — यह संस्कार है।

जिनवाणी संग्रह में ऐसे प्रसंग मिलते हैं, जहाँ साधकों ने त्रिरत्नों की आराधना करके केवलज्ञान प्राप्त किया। यह पर्व केवल परंपरा नहीं — यह इतिहास है। यह पर्व केवल विधि नहीं — यह अनुभूति है।

रत्नत्रय पर्व आत्मा को उसके मूल स्वरूप की ओर लौटने का निमंत्रण देता है। यह पर्व आत्मा को श्रद्धा, विवेक और संयम की त्रिवेणी में स्नान कराता है। यह पर्व आत्मा को मुक्तिपथ पर चलने की प्रेरणा देता है। यह पर्व आत्मा को परमात्मा बनने के पथ पर चलने की प्रेरणा देता है।

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